राष्ट्रीय युवा दिवस विशेष: इशारों में संवाद, हौसलों की उड़ान—‘द साइलेंट बिस्ट्रो’ में मूक-बधिर युवा रच रहे आत्मनिर्भरता की नई कहानी
राष्ट्रीय युवा दिवस
राष्ट्रीय युवा दिवस के मौके पर देहरादून के सहस्रधारा क्षेत्र में स्थित द साइलेंट बिस्ट्रो युवाओं की उस प्रेरक कहानी को सामने लाता है, जहां खामोशी भी संवाद बन जाती है और सीमित शब्दों के बिना भी सपने साकार हो रहे हैं। यह कैफे सिर्फ खाने-पीने की जगह नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, संघर्ष और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। खास बात यह है कि यहां काम करने वाले 10 में से 7 कर्मचारी मूक-बधिर हैं, जो इशारों की भाषा में न केवल एक-दूसरे से, बल्कि ग्राहकों से भी संवाद करते हैं।
सितंबर 2025 में शुरू हुए इस कैफे ने समाज को एक नई सोच दी है—कि शारीरिक सीमाएं कभी भी प्रतिभा और मेहनत की राह में बाधा नहीं बन सकतीं। यहां परोसे जाने वाले व्यंजन भले ही सामान्य हों, लेकिन उन्हें तैयार करने से लेकर ग्राहकों की मेज तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया आत्मबल और टीमवर्क की मिसाल है।
कैफे में ट्रांसलेटर की भूमिका निभा रहीं तनिष्का बताती हैं कि यहां नेपाल, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से आए मूक-बधिर युवा काम कर रहे हैं। वह कहती हैं कि साइन लैंग्वेज ही यहां संवाद की पहचान है, जो धीरे-धीरे ग्राहकों के लिए भी सीखने का माध्यम बन रही है।
कैफे में कार्यरत 23 वर्षीय समरीन की कहानी खास तौर पर प्रेरित करती है। देहरादून की रहने वाली समरीन ने बजाज इंस्टीट्यूट से पढ़ाई के बाद मुंबई के ताज होटल में इंटर्नशिप की। इसके बाद उन्होंने निजी रेस्टोरेंट्स में काम किया, लेकिन संवाद की मुश्किलों के चलते नौकरी छोड़नी पड़ी। हार न मानते हुए वह द साइलेंट बिस्ट्रो से जुड़ीं और आज पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने सपनों की ओर बढ़ रही हैं। समरीन का सपना है कि वह दुनिया घूमकर अलग-अलग देशों में काम करें। उनका मानना है कि जीवन बेहद खूबसूरत है और इसे खुलकर जीना चाहिए।
वहीं, टिहरी गढ़वाल के रहने वाले असिस्टेंट मैनेजर गौरीशंकर कहते हैं कि इस कैफे में हर दिन काम करना उन्हें नई प्रेरणा देता है। यहां के युवाओं का संघर्ष उनके अपने संघर्षों को छोटा बना देता है।
राष्ट्रीय युवा दिवस पर द साइलेंट बिस्ट्रो यह संदेश देता है कि अगर अवसर और विश्वास मिले, तो युवा—चाहे वे किसी भी चुनौती से जूझ रहे हों—अपनी पहचान खुद बना सकते हैं।
